सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दैनिक भास्कर में लिखे एक लेख में भारत के विकास और गांवों की भूमिका पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में विकास की चर्चा अक्सर महानगरों, उद्योगों और तकनीकी प्रगति के संदर्भ में होती है। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और तेज आर्थिक गतिविधियां प्रगति का प्रतीक मानी जाती हैं, लेकिन इस दौड़ में गांवों की आत्मा कहीं खोती जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विकास का मतलब यह होना चाहिए कि गांव धीरे-धीरे शहर बन जाएं, या फिर हमें ऐसा मॉडल अपनाना चाहिए जहां गांव अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिक सुविधाओं से लैस हों।
CJI ने हरियाणा के गांवों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां आज भी सामुदायिक जीवन, श्रम संस्कृति और सामाजिक सहभागिता की परंपरा जीवंत है। उन्होंने कहा कि यही स्थिति देश के कई अन्य राज्यों के गांवों में भी देखने को मिलती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की असली ताकत गांवों में है और यदि गांवों का चरित्र बदल गया तो भारत की आत्मा भी प्रभावित होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि गांवों में सड़कें, आधुनिक स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार के अवसर होना जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही गांवों की सामाजिक संरचना, सामूहिकता और पर्यावरणीय संतुलन को भी बचाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने ग्रामीण युवाओं के शहरों की ओर पलायन पर चिंता जताई और कहा कि यह केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि यह धारणा भी है कि सम्मानजनक जीवन और अवसर केवल शहरों में ही मिल सकते हैं।
CJI ने कहा कि अगर गांवों को सशक्त बनाया जाए और वहां सम्मान, अवसर और प्रगति के साधन उपलब्ध कराए जाएं, तो पलायन की प्रवृत्ति कम हो सकती है। उन्होंने कहा कि गांव केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना भी हैं। भारत की प्रगति का सही मापदंड यह होगा कि गांव कितने आत्मनिर्भर और सम्मानजनक बने।